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पंकज उधास ने गजल गायकी को दिया था नया

On 2 years Ago
VARHADVRUTT WEB TEAM

गजल की दुनिया में अपना खास मुकाम बनाने वाले पंकज उधास का निधन म्यूजिक इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा धक्का है। करीब चार दशक तक अपनी एक खास कशिश भरी मखमली आवाज से लाखों लोगों का दिल जीतने वाले गजल गायक पंकज उधास अब नहीं रहे। लम्बी बीमारी के बाद पंकज ने 72 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। उन्होंने करीब 36 सालों तक अपनी गायिकी से इंडस्ट्री को कई सदाबहार गाने दिए हैं। जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले पंकज उधास कैसे गायक बने।

17 मई 1951 को जेतपुर में जन्मे पंकज उधास एक जमींदार परिवार से ताल्लुक रखते थे। वह तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई मनहर उधास सिनेमा जगत के जाने-माने गायक थे। उनके एक और भाई निर्मल उधास भी जाने-माने गजल गायक थे। पंकज उधास को अपने बड़े भाई मनहर से गायिकी में आने का चस्का लगा। पंकज ने 1970 के दशक में गैर हिन्दू युवती के साथ अंतर्धार्मिक विवाह किया उस समय ऐसा करना बड़ा चुनौती भरा था। अपनी जीवन संगिनी फरीदा के साथ जान पहचान बनवाने में उनके पड़ोसी का हाथ रहा दरअसल, पंकज उधास की उनकी पत्नी फरीदा से पहली मुलाकात उनके पड़ोसी ने ही कराई थी। उस वक्त पंकज उधास ग्रैजुएशन कर रहे थे। वहीं, फरीदा एक एयरहोस्टेस थीं। पड़ोसी से कराई मुलाकात में पंकज और फरीदा की दोस्ती हो गई थी। इसके बाद दोनों की मुलाकातों का दौर शुरू हुआ। लगातार एक दूसरे के साथ डेट करने के बाद दोनों एक दूसरे के करीब आ गए और एक दूसरे को दिल दे बैठे। दोनों ने जल्द ही शादी करने का फैसला ले लिया था। लेकिन दोनों के बीच धर्म की दीवार आ खड़ी हुई थी। दरअसल, पंकज उधास हिंदू थे और फरीदा पारसी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। ऐसे में दोनों की शादी में परेशानी आ गई थी। पंकज की फैमिली इस रिश्ते सा राजी थी लेकिन फरीदा के घरवालों उनकी इस शादी से खुश नहीं थे। लेकिन यहां पंकज दोनों परिवारो की रजामंदी से ही अपना घर बसाना चाहते थे इसलिए दोनों ने तय की किया जब दोनों परिवार राजी होंगे तभी शादी करेंगे। हालांकि, कुछ समय बाद फरीदा के घरवालों ने भी शादी के लिए हामी भर दी और दोनों ने शादी कर ली

पकंज उदास और फरीदा की दो बेटियां रेवा उधास और नायाब उधास पंकज उधास के तीन भाई हैं. पंकज इन तीनों में सबसे छोटे थ। उनके दोनों भाई मनहर उधास और निर्मल उधास म्यूजिक फील्ड में ही है। इसलिए पंकज का रुझान भी इसी तरफ गया. पंकज ने अपने करियर में कई हिट गाने गाए हैं ‘चिट्टी आई है’ गाना उनका अबतक के सबसे मशहूर गाने में से एक है। पंकज उधास को फिल्मों में पहला बड़ा ब्रेक 1986 में आई फिल्म नाम से मिला था।

इस फिल्म में उन्होंने ‘चिट्ठी आई है’ गजल गाई थी, जिसे फैंस आज भी गुनगुनाते हैं. इसके बाद उन्होंने 80 और 90 के दशक में कई फिल्मों के लिए गजल गाई थीं। साल 1990 में फिल्म घायल में उन्होंने लता मंगेशकर के साथ माहिया तेरी कसम गाना गाया था। साल 1991 में उन्होंने फिल्म साजन में ‘जिए तो जिए कैसे, 1994 में मोहरा फिल्म में ‘न कजरे की धार’, ‘चांदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल’, ‘आहिस्ता कीजिए बातें’ जैसी गजलें गाई थीं. उनकी ज्यादातर गजल शराब और प्यार को लेकर थीं।

पंकज उधास ग़ज़ल की दुनिया का एक ऐसा नाम जिसने आते ही अपनी अलग आवाज से अपनी अलग पहचान बनाई और ऐसी कि उनकी गज़लों ने उस दौर में धूम मचा दी थी जो आज भी संगीत प्रेमियों के द्वारा उतने ही चाव से सुनी जाती है। वरिष्ठ विचारक इंदू सिंह मानतीं हैं कि जगजीत सिंह और तलत अज़ीज के मध्य अपनी गायिकी और ठहरी हुई मद्धम स्वर लहरी से पंकज उधास ने ग़ज़ल प्रसिद्धि दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी यही वजह कि ग़ज़ल की दुनिया में इन सबका अपना एक अलग मुकाम है और सबको उनकी अपनी गाई हुई ग़ज़ल के माध्यम से ही जाना जाता है। जिन्हें सुनकर ही श्रोतागण अपने प्रिय गायक का नाम ले पड़ते कि हर ग़ज़ल के साथ उसे गाने वाले का नाम चस्पा हो गया और जब भी कभी कहीं चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल एक तू ही धनवान है गौरी बाकी सब कंगाल ग़ज़ल हो या फिर एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा बजती सुनाई दे तो मस्तिष्क में पंकज उधास का चेहरा उतर आता जो इन ग़ज़लों का पर्याय बन गया है। इसके साथ ही फिल्मों में भी उन्होंने अपनी गायिकी का ऐसा जलवा दिखाया कि जब भी किसी फिल्म में उन्होंने कोई गीत या ग़ज़ल को गाया तो वह सुपरहिट बन गई यह उनकी आवाज और प्रस्तुति का जादू था जो सुनने वालों के सर चढ़कर बोलता था। नाम फिल्म ने उन्होंने जब अपनी आवाज में चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है बड़े दिनों के बाद हम बेवतनों को याद वतन की मिट्टी आई है गाकर प्रवासी भारतीयों के हृदय की पीड़ा को अभिव्यक्त किया तो सुनकर हर कोई रो पड़ा फिर भले वह भारत का ही रहने वाला क्यों न हो सबको शब्दों और गायिकी ने इस तरह से भीतर तक छू लिया था। साजन फ़िल्म में जिये तो जिये कैसे ग़ज़ल भी उनकी आवाज में जब बजती तो एक अलग ही प्रभाव छोड़ती जबकि इसे एसपी बाला सुब्रमण्यम, अनुराधा पौडवाल ने भी गाया लेकिन, जब रजत पर्दे पर पंकज उधास अपनी आवाज के साथ नमूदार होते तो ग़ज़ल भी मानो जीवंत हो उठती है। न कजरे की धार गाना भी मोहरा फ़िल्म की जान बन गया और अब तलक उसको सुनने पर अपने आपको गाने से रोक पाना मुमकिन नहीं होता और पंकज उधास के सुरों के संग हम सब भी अपनी बेसुरी आवाज़ में गाना शुरू कर देते हैं।

दीवारों से मिलकर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जाएंगे ऐसा लगता है… एक ऐसी ग़ज़ल जिसके दर्द को उनकी आवाज इस तरह से दर्शाती कि अगर किसी का अपना कोई बिछड़ गया हो तो उसे लगता कि उसकी पीड़ा को ही किसी ने शब्द दे दिए हो और स्वतः हो आंसुओं की धार लग जाती है और आहिस्ता कीजिये बातें धड़कनें कोई सुन रहा होगा ग़ज़ल के माध्यम से उन्होंने नई पीढ़ी के युवाओं के बीच भी अपनी जगह बनाई और इस तरह उन्होंने पांच दशक तक अलग-अलग पीढ़ी व वर्ग के श्रोताओं को अपनी मधुर आवाज और सुकून देनी वाली से भाव व संगीत की लहरों से भिगोया। पंकज उधास को साल 2006 में कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार की तरफ से पद्मश्री दिया गया है. इसके अलावा उन्हें साल 1985 में बेस्ट गजल सिंगर का के. एल. सहगल अवॉर्ड मिला था.

भारत के अलावा विदेश में भी उन्हें कई अवॉडर्स से सम्मानित किया गया है। अपनी गायिकी से लोगों को दीवाना बनाने वाले पंकज उदास की संपत्ति के बारे में बात करें तो रिपोटर्स के मुताबिक, वे अपने पीछे करीब 25 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति छोड़ गए हैं। आज पंकज उधास हमारे बीच नहीं हैं लेकिन अपनी गजलों और गायकी के जरिए वह हमेशा मौजूदा व आने वाली पीढ़ी के बीच स्मृतियों में बने रहेंगे। अलविदा पंकज उधास ! अब कोई चिठ्ठी नहीं आएगी?

मनोज कुमार अग्रवाल

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